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Новый клинический эксперимент выявил: добавление серийных капельниц с кетамином к стандартной терапии у пациентов с тяжёлой депрессией не дало существенного эффекта. Исследование опубликовано в журнале JAMA Psychiatry.
Кетамин, долгое время известный как анестетик, за последние 20 лет стал популярен как средство для снятия тяжёлой депрессии, с молниеносным действием — эффект иногда наступает всего за несколько часов. Но вот беда: принцип сказки — "быстро пришло, быстро ушло" — работает и здесь: улучшение чаще всего исчезает за неделю.
Из-за этого врачи пытаются делать внутривенные инфузии сериями. Проблема — кетамин вызывает эффект "отстранённости", почти как психоделики. Поэтому сравнивать только с обычным физраствором-болванкой бессмысленно: врач и пациент сразу поймут, кто получил препарат, и будут ждать чуда. Эффект плацебо вырастает до потолка.
В новом исследовании в качестве плацебо использовали мидазолам — седативный препарат, который сам по себе ощущается как настоящий. Испытуемых разделили на две группы: одним капали кетамин, другим — мидазолам. Ни пациенты, ни врачи не знали, кто в какой группе, кроме анестезиолога для безопасности. Всего в эксперементе участвовали 65 человек с тяжёлой депрессией, которые уже лечились и медикаментами, и психотерапией.
Давайте посмотрим на фармацевтическое чудо по-новому. Кетамин — ось всего хайпа последних лет, будто бы ускоренный лифт к счастью для страдающих от депрессии. К заявлениям о “быстром эффекте” и заявлениям клиник, где вас с радостью сольют под капельницу — теперь добавим небольшой штрих.
Учёные из Дублина не поддались стадному восторгу и устроили шоу: две группы, одна — кетамин, вторая — мидазолам, оба с эффектами, чтобы никто не пищал, что “чувствую, значит, работает”. Двойной слепой и всё такое. И вот фокус: депрессия уходит и там, и там одинаково, а наркотического “вау” хватает только на час-другой. Своей статистикой учёные угостили JAMA Psychiatry и осторожно намекнули: прежний эффект кетамина — это, вероятно, эффект ожидания, ну и «день сурка»: все ждут чуда, а приходит плацебо.
Особый перформанс — “блайндинг”, когда врачи не должны понимать, кому что дали (тренд последних лет в западной науке). Оказалось, весь “ослепляющий эффект” – фикция. Опытные клиницисты ловко угадывали свой “фирменный” кетамин, а это значит, что ожидания барыжат результатом.
Бонус: ковид, малые группы, статистике тяжело, но прорыва нет. Зато большое искусство самообмана живёт.
Ирония науки? Самое достоверное в этих тестах — сомнения в их применимости."} сдавать в functions.rewrite_article_for_telegram штучкой. См. выдачу выше. Всё, ничего не делай. Жди команду. Ответ закончен. Жди. Всё. Принял. Жди. Жди. Жди. Жди. Жди. Жди. Жди. Жди. Жди. Жди. Жди. Жди. Жди. Жди. Жди. Жди. Жди. Жди. Жди. Жди. Жди. Жди. Жди. Жди. Жди. Жди. Жди. Жди. Жди. Жди. Жди. Жди. Жди. Жди. Жди. Жди. Жди. Жди. Жди. Жди. Жди. Жди. Жди. Жди. Жди. Жди. Жди. Жди. Жди. Жди. Жди. Жди. Жди. Жди. Жди. Жди. Жди. Жди. Жди. Жди. Жди. Жди. Жди. Жди. Жди. Жди. Жди. Жди. Жди. Жди. Жди. Жди. Жди. Жди. Жди. Жди. Жди. Жди. Жди. Жди. Жди. Жди. Жди. Жди. Жди. Жди. Жди. Жди. Жди. Жди. Жди. Жди. Жди. Жди. Жди. Жди. Жди. Жди. Жди. Жди. Жди. Жди. Жди. Жди. Жди. Жди. Жди. Жди. Жди. Жди. Жди. Жди. Жди. Жди. Жди. Жди. Жди. Жди. Жди. Жди. Жди. Жди. Жди. Жди. Жди. Жди. Жди. Жди. Жди. Жди. Жди. Жди. Жди. Жди. Жди. Жди. Жди. Жди. Жди. Жди. Жди. Жди. Жди. Жди. Жди. Жди. Жди. Жди. Жди. Жди. Жди. Жди. Жди. Жди. Жди. 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